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Thursday, July 7, 2011

Obrigado querida, que os Espiritos de Luz te abencoe em nome do Mestre Jesus, e que seus Mentores Espiritual, estaja te guardado de todas emboscado dos inimigos invisivel e visivel...Que os anjos guardioes de Luz proteja seu lar e de seus familiares, Que assim seja!

7 comments:

  1. कफन फाड़कर मुर्दा बोला

    चमड़ी मिली खुदा के घर से
    दमड़ी नहीं समाज दे सका
    गजभर भी न वसन ढँकने को
    निर्दय उभरी लाज दे सका

    मुखड़ा सटक गया घुटनों में
    अटक कंठ में प्राण रह गये
    सिकुड़ गया तन जैसे मन में
    सिकुड़े सब अरमान रह गये

    मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
    जलने को जुट पाया इन्जन
    दाँतों के मिस प्रकट हो गया
    मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन

    किन्तु अचानक लगा कि यह,
    संसार बड़ा दिलदार हो गया
    जीने पर दुत्कार मिली थी
    मरने पर उपकार हो गया

    श्वेत माँग-सी विधवा की,
    चदरी कोई इन्सान दे गया
    और दूसरा बिन माँगे ही
    ढेर लकड़ियाँ दान दे गया

    वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
    धन्य हुआ मानव का चोला
    कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

    कहते मरे रहीम न लेकिन,
    पेट-पीठ मिल एक हो सके
    नहीं अश्रु से आज तलक हम,
    अमिट क्षुधा का दाग धो सके

    खाने को कुछ मिला नहीं सो,
    खाने को ग़म मिले हज़ारों
    श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
    भूखे-बेदम मिले हज़ारों

    दाने-दाने पर पाने वाले
    का सुनता नाम लिखा है
    किन्तु देखता हूँ इन पर,
    ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है

    दास मलूका से पूछो क्या,
    'सबके दाता राम' लिखा है?
    या कि गरीबों की खातिर,
    भूखों मरना अन्जाम लिखा है?

    किन्तु अचानक लगा कि यह,
    संसार बड़ा दिलदार हो गया
    जीने पर दुत्कार मिली थी
    मरने पर उपकार हो गया ।

    जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
    भोज मनाने बन्धु चल पड़े
    जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
    वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े

    निर्धन के घर हाथ सुखाते,
    नहीं किसी का अन्तर डोला
    कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

    घरवालों से, आस-पास से,
    मैंने केवल दो कण माँगा
    किन्तु मिला कुछ नहीं और
    मैं बे-पानी ही मरा अभागा

    जीते-जी तो नल के जल से,
    भी अभिषेक किया न किसी ने
    रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
    कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने

    बाप तरसता रहा कि बेटा,
    श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
    स्नेह-लता जो सूख रही है
    ज़रा प्यार से उसे जिला दे

    कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
    एक-एक को मार गिराया
    मन-मृग भोला रहा भटकता,
    निकली सब कुछ लू की माया

    किन्तु अचानक लगा कि यह,
    घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
    जीने पर दुत्कार मिली थी,
    मरने पर उपकार हो गया

    आश्चर्य वे बेटे देते,
    पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
    नमक-तेल रोटी क्या देना,
    कर न सके जो आत्म-समर्पण !

    जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
    और स्वर्ग के द्वार न खोला !
    कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

    Read more: http://www.funonthenet.in/forums/index.php?topic=8693.0#ixzz1SPk3qNTD

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  2. जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (१)

    दीप, जिनमें स्नेहकन ढाले गए हैं
    वर्तिकाएँ बट बिसुध बाले गए हैं
    वे नहीं जो आँचलों में छिप सिसकते
    प्रलय के तूफ़ान में पाले गए हैं

    एक दिन निष्ठुर प्रलय को दे चुनौती
    हँसी धरती मोतियों के बीज बोती
    सिंधु हाहाकार करता भूधरों का गर्व हरता
    चेतना का शव चपेटे, सृष्टि धाड़ें मार रोती

    एक अंकुर फूटकर बोला कि मैं हारा नहीं हूँ
    एक उल्का-पिण्ड हूँ, तारा नहीं हूँ
    मृत्यु पर जीवन-विजय उदघोष करता
    मैं अमर ललकार हूँ, चारा नहीं हूँ

    लाल कोंपल से गयी भर गोद धरती की
    कि लौ थी जगमगाई,
    लाल दीपों की प्रगति-परम्परा थी मुस्कराई,
    गीत, सोहर, लोरियाँ जो भी कहो तुम
    गोद कलियों से भरे लोनी-लता झुक झूम गायी
    और उस दिन ही किसी मनु ने अमा की चीर छाती
    मानवी के स्नेह में बाती डुबायी
    जो जली ऐसी कि बुझने की बुझायी-
    बुझ गयी, शरमा गयी, नत थरथरायी

    और जीवन की बही धारा जलाती दीप सस्वर
    आग-पानी पर जली-मचली पिघलने लगे पत्थर

    जल उठे घर, जल उठे वन
    जल उठे तन, जल उठे मन
    जल उठा अम्बर सनातन
    जल उठा अंबुधि मगन-मन
    और उस दिन चल पड़े थे साथ उन्चासों प्रभंजन
    और उस दिन घिर बरसते साथ उन्चासों प्रलय-घन

    अंधड़ों में वेग भरते वज्र बरबस टूट पड़ते
    धकधकाते धूमकेतों की बिखर जाती चिनगियाँ
    रौद्र घन की गड़गड़ाहट कड़कड़ाती थी बिजलियाँ

    और शिशु लौ को कहीं साया न था, सम्बल नहीं था
    घर न थे, छप्पर न थे, अंचल नहीं था
    हर तरफ़ तूफ़ान अन्धड़ के बगूले
    सृष्टि नंगी थी अभी बल्कल नहीं था

    सनसनाता जब प्रभंजन लौ ध्वजा-सी फरफराती
    घनघनाते घन कि दुगुणित वेदना थी मुस्कराती
    जब झपेटों से कभी झुक कर स्वयं के चरण छूती
    एक लोच कमान की तारीकियों को चीर जाती

    बिजलियों से जो कभी झिपती नहीं थी
    प्रबल उल्कापात से छिपती नहीं थी
    दानवी तम से अकड़ती होड़ लेती
    मानवी लौ थी कि जो बुझती नहीं थी
    क्योंकि उसको शक्ति धरती से मिली थी
    हर कली जिस हवा पानी में खिली थी

    सहनशीलता, मूकतम जिसकी अतल गहराइयों में
    आह की गोड़ी निगोड़ी खाइयों में
    स्नेह का सोता बहा करता निरंतर
    बीज धँसता ही चला जाता जहाँ जड़ मूल बनकर
    गोद में जिसके पला करता विधाता विवश बनकर

    धात्री है वह सृजन के पंथ से हटती नहीं है
    व्यर्थ के शिकवे प्रलय-संहार के रटती नहीं है
    जानती है वह कि मिट्टी तो कभी मिटती नहीं है
    आग उसकी ही निरंतर हर हृदय में जल रही है

    स्वर्ण दीपों की सजीव परम्परा-सी चल रही है
    हर अमा में, हर ग्रहन की ध्वंसपूर्ण विभीषिका में
    एक कसकन, एक धड़कन, बार-बार मचल रही है
    बर्फ की छाती पिघलकर गल रही है, ढल रही है

    आज भी तूफान आता सरसराता
    आज भी ब्रह्माण्ड फटता थरथराता
    आज भी भूचाल उठते, क़हर ढहता
    आज भी ज्वालामुखी लावा उगलता

    एक क्षण लगता की जीत गया अँधेरा
    एक क्षण लगता कि हार गया सवेरा
    सूर्य, शशि, नक्षत्र, ग्रह-उपग्रह सभी को
    ग्रस रहा विकराल तम का घोर घेरा

    किंतु चुंबक लौह में फिर पकड़ होती
    दो दिलों में, धमनियों में रगड़ होती
    वासना की रूई जर्जर बी़च में ही
    उसी लौ की एक चिनगी पकड़ लेती

    और पौ फटती, छिटक जाता उजाला
    लाल हो जाता क्षितिज का वदन काला
    देखते सब, अंध कोटर, गहन गह्वर के तले पाताल की मोटी तहों को
    एक नन्ही किरण की पैनी अनी ने छेद डाला,
    मैं सुनाता हूँ तुम्हें जिसकी कहानी
    बात उतनी ही नयी है, हो चुकी जितनी पुरानी
    जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी

    Read more: http://www.funonthenet.in/forums/index.php?topic=8693.0#ixzz1SPl1P9Uo

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  3. जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (१)

    दीप, जिनमें स्नेहकन ढाले गए हैं
    वर्तिकाएँ बट बिसुध बाले गए हैं
    वे नहीं जो आँचलों में छिप सिसकते
    प्रलय के तूफ़ान में पाले गए हैं

    एक दिन निष्ठुर प्रलय को दे चुनौती
    हँसी धरती मोतियों के बीज बोती
    सिंधु हाहाकार करता भूधरों का गर्व हरता
    चेतना का शव चपेटे, सृष्टि धाड़ें मार रोती

    एक अंकुर फूटकर बोला कि मैं हारा नहीं हूँ
    एक उल्का-पिण्ड हूँ, तारा नहीं हूँ
    मृत्यु पर जीवन-विजय उदघोष करता
    मैं अमर ललकार हूँ, चारा नहीं हूँ

    लाल कोंपल से गयी भर गोद धरती की
    कि लौ थी जगमगाई,
    लाल दीपों की प्रगति-परम्परा थी मुस्कराई,
    गीत, सोहर, लोरियाँ जो भी कहो तुम
    गोद कलियों से भरे लोनी-लता झुक झूम गायी
    और उस दिन ही किसी मनु ने अमा की चीर छाती
    मानवी के स्नेह में बाती डुबायी
    जो जली ऐसी कि बुझने की बुझायी-
    बुझ गयी, शरमा गयी, नत थरथरायी

    और जीवन की बही धारा जलाती दीप सस्वर
    आग-पानी पर जली-मचली पिघलने लगे पत्थर

    जल उठे घर, जल उठे वन
    जल उठे तन, जल उठे मन
    जल उठा अम्बर सनातन
    जल उठा अंबुधि मगन-मन
    और उस दिन चल पड़े थे साथ उन्चासों प्रभंजन
    और उस दिन घिर बरसते साथ उन्चासों प्रलय-घन

    अंधड़ों में वेग भरते वज्र बरबस टूट पड़ते
    धकधकाते धूमकेतों की बिखर जाती चिनगियाँ
    रौद्र घन की गड़गड़ाहट कड़कड़ाती थी बिजलियाँ

    और शिशु लौ को कहीं साया न था, सम्बल नहीं था
    घर न थे, छप्पर न थे, अंचल नहीं था
    हर तरफ़ तूफ़ान अन्धड़ के बगूले
    सृष्टि नंगी थी अभी बल्कल नहीं था

    सनसनाता जब प्रभंजन लौ ध्वजा-सी फरफराती
    घनघनाते घन कि दुगुणित वेदना थी मुस्कराती
    जब झपेटों से कभी झुक कर स्वयं के चरण छूती
    एक लोच कमान की तारीकियों को चीर जाती

    बिजलियों से जो कभी झिपती नहीं थी
    प्रबल उल्कापात से छिपती नहीं थी
    दानवी तम से अकड़ती होड़ लेती
    मानवी लौ थी कि जो बुझती नहीं थी
    क्योंकि उसको शक्ति धरती से मिली थी
    हर कली जिस हवा पानी में खिली थी

    सहनशीलता, मूकतम जिसकी अतल गहराइयों में
    आह की गोड़ी निगोड़ी खाइयों में
    स्नेह का सोता बहा करता निरंतर
    बीज धँसता ही चला जाता जहाँ जड़ मूल बनकर
    गोद में जिसके पला करता विधाता विवश बनकर

    धात्री है वह सृजन के पंथ से हटती नहीं है
    व्यर्थ के शिकवे प्रलय-संहार के रटती नहीं है
    जानती है वह कि मिट्टी तो कभी मिटती नहीं है
    आग उसकी ही निरंतर हर हृदय में जल रही है

    स्वर्ण दीपों की सजीव परम्परा-सी चल रही है
    हर अमा में, हर ग्रहन की ध्वंसपूर्ण विभीषिका में
    एक कसकन, एक धड़कन, बार-बार मचल रही है
    बर्फ की छाती पिघलकर गल रही है, ढल रही है

    आज भी तूफान आता सरसराता
    आज भी ब्रह्माण्ड फटता थरथराता
    आज भी भूचाल उठते, क़हर ढहता
    आज भी ज्वालामुखी लावा उगलता

    एक क्षण लगता की जीत गया अँधेरा
    एक क्षण लगता कि हार गया सवेरा
    सूर्य, शशि, नक्षत्र, ग्रह-उपग्रह सभी को
    ग्रस रहा विकराल तम का घोर घेरा

    किंतु चुंबक लौह में फिर पकड़ होती
    दो दिलों में, धमनियों में रगड़ होती
    वासना की रूई जर्जर बी़च में ही
    उसी लौ की एक चिनगी पकड़ लेती

    और पौ फटती, छिटक जाता उजाला
    लाल हो जाता क्षितिज का वदन काला
    देखते सब, अंध कोटर, गहन गह्वर के तले पाताल की मोटी तहों को
    एक नन्ही किरण की पैनी अनी ने छेद डाला,
    मैं सुनाता हूँ तुम्हें जिसकी कहानी
    बात उतनी ही नयी है, हो चुकी जितनी पुरानी
    जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी

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  4. अच्छी किताब

    एक अच्छी किताब अन्धेरी रात में
    नदी के उस पार किसी दहलीज़ पर
    टिमटिमाते दीपक की ज्योति है
    दिल के उदास काग़ज़ पर
    भावनाओं का झिलमिलाता मोती है
    जहाँ लफ़्ज़ों में चाहत के सुर बजते है

    ये वो साज़ है
    इसे तनहाइयों में पढ़ो
    ये खामोशी की आवाज़ है
    एक बेहतर किताब हमारे जज़्बात में

    उम्मीद की तरह घुलकर
    कभी हँसाती, कभी रुलाती है
    रिश्तों के मेलों में बरसों पहले बिछड़े
    मासूम बचपन से मिलाती है
    एक संजीदा किताब
    हमारे सब्र को आज़माती है

    किताब को ग़ौर से पढ़ो
    इसके हर पन्ने पर
    ज़िन्दगी मुस्कराती है

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  5. A girl asked a boy if she was pretty, he said "No". She asked him if he wanted to be with her forever, he said "No". Then she asked him if he would cry if she walked away, he said "No". She had heard enough; she needed to leave.
    As she walked away he grabbed her arm and told her to stay. He said "You're not pretty, you're beautiful. I don`t want to be with you forever, I need to be with you forever. And I wouldn't cry if you walked away, I would die."
    ////A girl asked a boy if she was pretty, he said "No". She asked him if he wanted to be with her forever, he said "No". Then she asked him if he would cry if she walked away, he said "No". She had heard enough; she needed to leave.
    As she walked away he grabbed her arm and told her to stay. He said "You're not pretty, you're beautiful. I don`t want to be with you forever, I need to be with you forever. And I wouldn't cry if you walked away, I would die."
    //////////////Love Means... (a girl and guy were speeding over 100 mph on a motorcycle)
    Girl: Slow down. I'm scared.
    Guy: No this is fun.
    Girl: No its not. Please, it's too scary!
    Guy: Then tell me you love me.
    Girl: Fine, I love you. Slow down! Guy: Now give me a big hug. (Girl hugs him)
    Guy: Can you take my helmet off and put it on? It's bugging me.
    In the paper the next day: A motorcycle had crashed into a building because of break failure. Two people were on the motorcycle, but only one survived. The truth was that halfway down the road, the guy realized that his breaks broke, but he didn't want to let the girl know. Instead, he had her say she loved him, felt her hug one last time, then had her wear his helmet so she would live even though it meant he would die.

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    1. Good FRIENDS CaRE for each Other..
      CLoSE Friends UNDERSTaND each Other...
      and TRUE Friends STaY forever
      beyond words,
      beyond time...**

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  6. V .... é para Valentine, você é minha namorada só
    A ..... é para sempre serei seu
    L ..... é para o amor em sua forma mais extrema
    E ..... é para o amor eterno, o amor Ecstatic.
    N ..... é por amor sem fim
    T ..... é para nós sempre estaremos juntos para sempre
    Eu ..... é para você ser inteligente e inocente;
    N .... é de 4 Natures maneira impertinente de dizer I luv você
    E ..... é para a eternidade nosso amor é assim sempre duradoura.

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