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Friday, October 29, 2010

maa

माँ तेरे बिना जी नहीं लगता है
तेरी गोदी मे खो जाऊ दिल करता है

साथ रहती है तू तो लड़ लेता हूँ सबसे
जब दूर रहती है , तो डर लगता है


जाने कितने है निशान जख्मो के इस जिस्म पर
पर जिन्दा हूँ अब तलक ,तेरी दुआओ का असर लगता है

तेरे दिखाए हुए रास्तो का ही सबब है
जो आस्मा अब धुला धुला सा लगता है

तू खिला देती थी कई रोटिया अपने नरम हाथो से
अब ठंडा रहता है चूल्हा , पर पेट भरा सा लगता हँ

तू डांटती थी बिस्तर पर फैला सामान देखकर
अब तू नहीं हँ तो सारा घर बिखरा सा लगता है

तू जगाती थी मुझको एक नई सुबह लेकर
अब उठता हूँ तो रोज की तरह पुराना सवेरा लगता है

जिस मंदिर मे तू सोते उठते ही जलाती थी चिराग
अब देखता हूँ तो वो कभी कभार ही रोशन लगता है

जिस घर को तू सजाती थी बड़े जतन से
अब वो घर चिडियों का बसेरा लगता है

तूने ही सिखाया है लड़खड़ाते हुए कदमो को चलना
अब भले रास्ते टेढ़े मेढ़े है , पर नितीश सीधे चलता

80 comments:

  1. प के करीब आता हुआ ये साल ढेरों चाहे - अनचाहे अरमानों को वक़्त के जिगर में समेटे रफ्ता रफ्ता आप की झोली भरने को बेताब हो रहा है आप भी गुजरते हुए साल के हर गिले-शिकवे भूल कर नए साल की नई किरणों का उदार, निष्कपट ह्रदय और प्रफुल्लित मन से नंगे पावँ, दोनों बाहें पसारे स्वागत करने को आतुर रहें , वैसे भी बगैर सुख-दुःख के तो जीने का मज़ा ही कहाँ है सच कहूं तो इसके बिना जीवन बदरंग हो जाता है इसलिए वक्त के हर लम्हे को जीने की कोशिश करें , जिससे बाद में ये मलाल ना हो की आप ने अपने जीवन के किसी अनजान लम्हे को miss कर दिया, इसलिए मै अपने सभी अजीज दोस्तों से गुज़ारिश करता हूँ आने वाले साल का तहेदिल् से स्वागत करें .......

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  2. ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!

    इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
    ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!

    कोई नेह नहीं कोई सेज नहीं
    कोई चांदी की पाजेब नहीं
    बेकरार रात का चाँद नहीं
    कोई सपनों का सामान नहीं
    इन पत्तों की झनकार तले
    किस थाप-राग मे हृदय घुले
    ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!

    न भाषा कोई के कह दूँ मैं
    न आग-आह जो सह लूँ मैं
    विकल बड़ा यह श्वास सा
    शब्दहीन विचलित आस सा
    जहाँ इंद्रधनुष व क्षितिज मिले
    कुछ ऐसी जगह वह पले बढ़े
    ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!

    इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
    ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!

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  3. Mαis um αno se pαssαndo {2010}
    Grαçαs α Deus α
    gentte ttα com sαúde αí neh ?
    Muitα coletividαde ,
    Vαmos brindαr o diα de hoje
    Q o αmαnhα só pertence α
    Deus .. '


    &&
    qê venhα {2011} , Qê
    seje mαs un αno de αlegriαs ,
    qê nαo tenhαmos nenhumα perdα , qê
    Deus ilumine nossos cαminhos ,
    qê sejαmos felizes , qê nossαs
    alegriia sejαm αlcαnçαdαs (yy)

    boon
    fin de 2010 &&
    un ottimo 2011

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  4. काश हृदय पत्थर का होता

    पाकर चोट न झरते आँसू
    नहीं हृदय से आह निकलती
    प्यार और विश्वास में छ्ल पा
    दिल का शीशा चूर न होता

    हृदय बनाकर यदि वो ईश्वर
    कठिन प्यार की चाह न देता
    तो फिर जीना शायद इतना
    पीड़ा से बोझिल न होता

    निर्विकार सह लेता सुख दुख
    हास अश्रु औ’ प्यार न होता
    नहीं हृदय टूटा करता तब
    नहीं कोई मर मरकर जीता

    पीड़ा का अभिशाप दिया जो
    मन तो फूलों सा न बनाता
    क्रूर नियति से चोटें खा खा
    दो दिन में ना मुरझा जाता

    विरहन चकई की चीखें सुन
    चाँद कभी आँसू ना रोता
    शब्द बाण फिर हृदय चीरकर
    सारा लहू न अश्रु बनाता

    काश हृदय पत्थर का होता ....

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  5. पुण्य करते हुए भी थकते हैं

    जलते—जलते दिये भी थकते हैं


    बोलते— बोलते जुबान थकी

    गाते—गाते गले भी थकते हैं


    हर कदम पर अगर पराजय हो

    तो बुलँद हौसले भी थकते हैं


    महफिलों, चुटकलों, ठहाकों से

    एक दिन, मसखरे भी थकते हैं


    चलते—चलते तो थक ही जाते हैं

    सोचते—सोचते भी थकते हैं


    मंजिलों तक जो ले गए हमको

    वे सभी रास्ते भी थकते हैं


    अंत में लोग अपने जीवन से

    जूझते— जूझते भी थकते हैं.

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  7. Encerra-se mais um ano !
    Quando este ano começou, ele era todo seu.
    Foi colocado em suas mãos... Podia fazer dele o que quisesse...
    Era como um Livro em Branco, e nele você podia ter um poema,
    um pesadelo uma blasfêmia, uma oração.
    Podia... Hoje não pode mais, já não é seu.
    É um livro já escrito... Concluído...
    Como um livro que tivesse sido escrito por você,
    ele um dia lhe será lido, com todos os detalhes,
    e não poderá corrigi-lo.
    Estará fora de seu alcance.
    Portanto... Antes que termine este ano, reflita,
    tome seu velho livro e folheie com cuidado...
    Deixe passar cada uma das páginas pelas mãos e pela consciência;
    Faça o exercício de ler a você mesmo.
    Leia tudo... Aprecie aquelas páginas de sua vida em que usou seu melhor estilo.
    Leia também as páginas que gostaria de nunca ter escrito.
    Não... Não tentes arrancá-las. Seria inútil... Já estão escritas.
    Mas você pode lê-las enquanto escreve o novo livro que será entregue.
    Assim, poderá repetir as boas coisas que escreveu, e evitar repetir as ruins.
    Para escrever o seu novo livro, você contará novamente com o instrumento do livre arbítrio.
    Se tiver vontade de chorar, chore sobre ele e, a seguir, coloque-o nas mãos do Criador.
    Não importa como esteja...
    Ainda que tenha páginas negras, entregue e diga apenas duas palavras: Obrigado e Perdão!!!
    E quando o novo ano chegar, lhe será entregue outro livro,
    novo, limpo, branco, todo seu, no qual irá escrever o que desejar...
    FELIZ LIVRO NOVO
    Com carinho pra você!

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  8. ♥═♥FELIZ Ano Novo♥═♥
    ♥═♥Para Voce♥═♥

    Mais um ano se passa,
    E juntos podemos comemorar,
    A virada de um novo tempo,
    De encher nossos corações,
    De esperanças,
    De dizer adeus ano velho,
    Feliz ano novo.
    É muito bom ter alguém,
    Tão especial como você;
    Alguém que posso contar,
    Sempre que preciso;
    Que me dá carinho e atenção;
    Você é tudo o que eu preciso.;

    As barreiras e passar,
    Para este outro ano,
    Que com certeza será melhor.
    Desejo que esse ano,
    Seja um ano de realizações,
    Que você consiga atingir,
    Todas as suas metas,
    E que seja um ano,
    De muita paz,
    Saúde e alegria.;

    Feliz ano novo.;

    ♥═♥♥═Beijos De Luz═♥♥═♥
    ♥═No Teu Coração═♥

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  9. --- व्यवहारिक सूत्र ----
    १. संकल्प लीजिये कि आप अपने मन की शांति भंग नहीं होने देंगे।
    कोई भी बात, कोई भी परिस्थिति, कोई भी घटना आप से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। आप की सुख-शांति से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उद्विग्न होने से क्या लाभ? आप की व्याकुलता किस काम की? आज तक किसी ने भी अपनी व्याकुलता से किसी समस्या का समाधान नहीं किया।
    २. संकल्प लीजिये कि आप अपने मित्रों, रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों को स्वस्थ और सुखी रहने की प्ररेणा देंगे।
    साईं बाबा कहते हैं — सुख चाहो ता सुख दो। दूसरों को सुखी और समृद्ध देखने की कामना में आपके अपने सुख का रहस्य छुपा हुआ है। अपने आप को प्रफुल्लित रखना चाहते हो, तो किसी और को प्रफुल्लित कीजिये।
    ३. संकल्प लीजिये कि आप दूसरों को उनके दोषों से नहीं, उनके गुणों से अवगत करायेंगे।
    हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा छिपी हुई है। किसी दूसरे के विशिष्ट गुण को उजागर करने में उसकी सहायता कीजिये और उसे उसकी प्रतिभा का विकास करने के लिये प्रोत्साहन दीजिये। आप के सहयोग से यदि किसी का जीवन सुख से भर जाये तो क्या आप के लिये यह प्रसन्नता की बात नहीं होगी?
    ४. संकल्प लीजिये कि आप के पास जो कुछ है उसके लिये आप कृतज्ञता से भरे रहेंगे।
    हम सब मालामाल हैं। बस, हमें अपना ध्यान उन चीजों पर केन्द्रित करना है जो हमारे पास हैं, न कि उन पर जो हमारे पास नहीं हैं। जो हृदय कृतज्ञता से भरा होता है उस में निराशा नहीं टिक सकती।
    ५. संकल्प लीजिये कि आप अपना काम निष्ठा और लगन के साथ करेंगे।
    यह एक बड़े आश्चर्य की बात है कि जो व्यक्ति अपना काम पूरी जिम्मेवारी और मेहनत के साथ करता है,उसकी परिस्थितियाँ अपने आप उसके अनुकूल होती चली जाती हैं।
    ६. संकल्प लीजिये कि दूसरों की सफलता में भी आप उतनी ही रुचि लेंगे जितनी अपनी सफलता में।
    हम सब अपनी सफलता के प्रति उत्साह से भरे होते हैं। क्या वही उत्साह हम दूसरों की सफलता के लिये नहीं दिखा सकते? आप चाहें तो आपके भाई-बहिनों, मित्रों और रिश्तेदारों की सफलता भी आप को उमंग से भर सकती है। जो बेगानी शादी में भी नाच सकता है, उसके लिये मौज की कोई कमी नहीं।
    ७. संकल्प लीजिए कि आप भूतकाल की गल्तियों पर पश्चाताप नहीं करेंगे।
    आप का काम पश्चाताप से नहीं, सुधार से बनता है। अपनी ऊर्जा को पश्चाताप में नष्ट मत होने दीजिये —उसे अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के प्रयत्न में लगाइये।
    ८. संकल्प लीजिये कि आप के चेहरे से हमेशा प्रसन्नता ही झलकती रहेगी।
    लटका हुआ चेहरा किसी को कुछ नहीं दे सकता — स्वयं अपने को भी नहीं। आप की मुस्कान बड़ी संक्रामक (contagious) है। अपने चेहरे पर मुस्कान लाइये और फिर देखिये कि कितनी जल्दी आप के आसपास सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट फैल जाती है।
    ९. संकल्प लीजिये कि आप अपने परिष्कार में इतने तल्लीन रहेंगे कि दूसरों की आलोचना करने का समय ही न बच पाये।
    हमारी सफलता अपने आप को सुधारने में है, दूसरों की निन्दा करने में नहीं। जो समय हम दूसरों की बुराई में नष्ट करते हैं, वह समय अपने आप को सुसंस्कृत बनाने में लगाया जा सकता है।
    १०. संकल्प लीजिए कि आप संसार का भोग तो अवश्य करेंगे, लेकिन उसमें लिप्त नहीं होंगे।
    भोग कर के भोग से ऊपर उठ जाना देवता की विशेषता है। जो भोग कर के आगे बढ़ जाता है, उस की चिन्ताएँ पीछे रह जाती हैं। जो पाने के बाद देने में रुचि लेने लगता है, उसका क्ोध कम हो जाता है। जिसे अपने आप पर विश्वास हो जाता है, उसका भय दूर हो जाता है। जिसका लक्ष्य ही सुख की प्राप्ति है, उसे खलेथों की उपस्थिति का पता ही नहीं चल पाता।
    ११. संकल्प लीजिये कि आप अपना हर काम जागरूक रह कर करेंगे।
    अपने हर विचार का जागरूक रह कर निरीक्षण कीजिये, क्योंकि आपका विचार आप का कथन बनता है।
    अपनी हर बात को जागरूक रह कर कहिए क्योंकि आप का कथन आपका कर्म बनता है।
    अपने हर कर्म को जागकर कीजिये, क्योंकि आपके कर्म से आपकी आदत बनती है।
    अपनी हर आदत को जागकर देखिये क्योंकि आप की आदत आप का चरित्र बनती है।
    अपने चरित्र को जाग कर देखिये, क्योंकि आप का चरित्र ही आप का जीवन है।
    संक्षेप में,
    आपका जागरण ही आपकी सफलता है।
    जागिए!!!

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  10. --- व्यवहारिक सूत्र ----
    १. संकल्प लीजिये कि आप अपने मन की शांति भंग नहीं होने देंगे।
    कोई भी बात, कोई भी परिस्थिति, कोई भी घटना आप से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। आप की सुख-शांति से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उद्विग्न होने से क्या लाभ? आप की व्याकुलता किस काम की? आज तक किसी ने भी अपनी व्याकुलता से किसी समस्या का समाधान नहीं किया।
    २. संकल्प लीजिये कि आप अपने मित्रों, रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों को स्वस्थ और सुखी रहने की प्ररेणा देंगे।
    साईं बाबा कहते हैं — सुख चाहो ता सुख दो। दूसरों को सुखी और समृद्ध देखने की कामना में आपके अपने सुख का रहस्य छुपा हुआ है। अपने आप को प्रफुल्लित रखना चाहते हो, तो किसी और को प्रफुल्लित कीजिये।
    ३. संकल्प लीजिये कि आप दूसरों को उनके दोषों से नहीं, उनके गुणों से अवगत करायेंगे।
    हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा छिपी हुई है। किसी दूसरे के विशिष्ट गुण को उजागर करने में उसकी सहायता कीजिये और उसे उसकी प्रतिभा का विकास करने के लिये प्रोत्साहन दीजिये। आप के सहयोग से यदि किसी का जीवन सुख से भर जाये तो क्या आप के लिये यह प्रसन्नता की बात नहीं होगी?
    ४. संकल्प लीजिये कि आप के पास जो कुछ है उसके लिये आप कृतज्ञता से भरे रहेंगे।
    हम सब मालामाल हैं। बस, हमें अपना ध्यान उन चीजों पर केन्द्रित करना है जो हमारे पास हैं, न कि उन पर जो हमारे पास नहीं हैं। जो हृदय कृतज्ञता से भरा होता है उस में निराशा नहीं टिक सकती।
    ५. संकल्प लीजिये कि आप अपना काम निष्ठा और लगन के साथ करेंगे।
    यह एक बड़े आश्चर्य की बात है कि जो व्यक्ति अपना काम पूरी जिम्मेवारी और मेहनत के साथ करता है,उसकी परिस्थितियाँ अपने आप उसके अनुकूल होती चली जाती हैं।
    ६. संकल्प लीजिये कि दूसरों की सफलता में भी आप उतनी ही रुचि लेंगे जितनी अपनी सफलता में।
    हम सब अपनी सफलता के प्रति उत्साह से भरे होते हैं। क्या वही उत्साह हम दूसरों की सफलता के लिये नहीं दिखा सकते? आप चाहें तो आपके भाई-बहिनों, मित्रों और रिश्तेदारों की सफलता भी आप को उमंग से भर सकती है। जो बेगानी शादी में भी नाच सकता है, उसके लिये मौज की कोई कमी नहीं।
    ७. संकल्प लीजिए कि आप भूतकाल की गल्तियों पर पश्चाताप नहीं करेंगे।
    आप का काम पश्चाताप से नहीं, सुधार से बनता है। अपनी ऊर्जा को पश्चाताप में नष्ट मत होने दीजिये —उसे अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के प्रयत्न में लगाइये।
    ८. संकल्प लीजिये कि आप के चेहरे से हमेशा प्रसन्नता ही झलकती रहेगी।
    लटका हुआ चेहरा किसी को कुछ नहीं दे सकता — स्वयं अपने को भी नहीं। आप की मुस्कान बड़ी संक्रामक (contagious) है। अपने चेहरे पर मुस्कान लाइये और फिर देखिये कि कितनी जल्दी आप के आसपास सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट फैल जाती है।
    ९. संकल्प लीजिये कि आप अपने परिष्कार में इतने तल्लीन रहेंगे कि दूसरों की आलोचना करने का समय ही न बच पाये।
    हमारी सफलता अपने आप को सुधारने में है, दूसरों की निन्दा करने में नहीं। जो समय हम दूसरों की बुराई में नष्ट करते हैं, वह समय अपने आप को सुसंस्कृत बनाने में लगाया जा सकता है।
    १०. संकल्प लीजिए कि आप संसार का भोग तो अवश्य करेंगे, लेकिन उसमें लिप्त नहीं होंगे।
    भोग कर के भोग से ऊपर उठ जाना देवता की विशेषता है। जो भोग कर के आगे बढ़ जाता है, उस की चिन्ताएँ पीछे रह जाती हैं। जो पाने के बाद देने में रुचि लेने लगता है, उसका क्ोध कम हो जाता है। जिसे अपने आप पर विश्वास हो जाता है, उसका भय दूर हो जाता है। जिसका लक्ष्य ही सुख की प्राप्ति है, उसे खलेथों की उपस्थिति का पता ही नहीं चल पाता।
    ११. संकल्प लीजिये कि आप अपना हर काम जागरूक रह कर करेंगे।
    अपने हर विचार का जागरूक रह कर निरीक्षण कीजिये, क्योंकि आपका विचार आप का कथन बनता है।
    अपनी हर बात को जागरूक रह कर कहिए क्योंकि आप का कथन आपका कर्म बनता है।
    अपने हर कर्म को जागकर कीजिये, क्योंकि आपके कर्म से आपकी आदत बनती है।
    अपनी हर आदत को जागकर देखिये क्योंकि आप की आदत आप का चरित्र बनती है।
    अपने चरित्र को जाग कर देखिये, क्योंकि आप का चरित्र ही आप का जीवन है।
    संक्षेप में,
    आपका जागरण ही आपकी सफलता है।
    जागिए!!!

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  11. bjs minhaसपने सिर्फ़ नहीं सपने
    अपने हैं किसके अपने

    दिल फूला फैली ख़ुश्बू
    बिंधने पर लगता डसने

    वह जाने वह कैसा है
    भोले नाम लगे जपने

    पलकों ने पल-पल रोका
    मन गुस्ताख़ लगा तकने

    दर्द नहीं तो क्या लिखना
    सब कैसे लगते छपने

    कुन्दन बन तब है प्यारे
    यों ही क्यों लगता तपने

    मिट्टी ने डाले फंदे
    लोग कहें आये बसने

    रात हमेशा अपनी है
    नींद पराई क्या सपने

    मीठे मौसम बीत गये
    आये थे वे दिल रखने amiga tudo de bom feliz 2011

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  12. काश यह दिल सीख पाता

    *****

    काश यह दिल सीख पाता दर्द के करना किनारा
    झील ग़म की और यह था सिर्फ़ इक जर्जर शिकारा

    उम्र का छप्पर टपकता है बिना बरसात के ही
    याद का कोई न उमड़े अब कहीं बादल कुँवारा

    किस तरह अपनी गली में खिड़कियाँ भी दें तसल्ली
    झाँकना है गर बुरा तो जुर्म है करना इशारा

    रंग-ख़ुश्बू नेकनीयत हैं यहाँ किसने कहा है
    जाल हो सकता सभी में हो जहाँ सुन्दर नज़ारा

    भूल जाना ज़िंदगी का कम नहीं अनमोल तोह्फ़ा
    भूलकर हमदर्द मेरे कह रहे भूलो दुबारा

    होड़ तिनके से भला कमज़ोर कश्ती क्या करेगी
    डूबने वाला चला है लहर का लेकर सहारा

    घोंटता दम जब अँधेरा टिमटिमाता है अकेला
    गिर पड़े आकाश से तो टूटकर चमके सितारा

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  13. आदमी के हैं अनोखे काम जी
    क्यों करो छुट्टी न अपनी राम जी

    देवता करते बहुत आराम जी
    नौकरी कोई न उनका काम जी

    हो गया है अब मुझे इल्हाम जी
    बन गया गाली मधुर हरिनाम जी

    राम का मन्दिर बने या धाम जी
    है मुनाफ़े का बड़ा यह काम जी

    उस्तरे बिन मूँड़ते हज्जाम जी
    लोग नेता का इन्हें नाम जी

    वोट देने का हुआ अंजाम जी
    काम बैन नेता करे विश्राम जी

    चापलूसी को न दो इल्ज़ाम जी
    पाठ पूजा है इसी का नाम जी

    लो पटाये हैं सभी हुक्काम जी
    ख़ूब मक्खन ने बनाया काम जी

    हो गये तुम किस लिए बदनाम जी
    घूस से धुलवाइए इल्ज़ाम जी

    माँगते हो प्यार क्यों बेदाम जी
    हो रही हर चीज़ अब नीलाम जी

    हुस्न होता है लिफ़ाफ़ा चाम जी
    जो समझ ले ख़त वही गुल्फ़ाम जी

    वक़्त की सूइयाँ न सकते थाम जी
    जा रही है उम्र बनने शाम जी

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  14. जान देते थे पुराने यार दीवाने कभी
    सोचते जलने की थे कब बात परवाने कभी

    हाथ में था हाथ उनका यह तसल्ली थी हमें
    क्या पता था काट देंगे हाथ दस्ताने कभी

    भूख लगने पर परिंदे आये हैं नीचे सदा
    जाल दिखते हैं न उनको साथ में दाने कभी

    भूल जाने का हमें आखिर वचन उसने दिया
    भूल पायेगा मगर क्या यार अफ़साने कभी
    मानते तक़्दीर तुमको कर नहीं सकते गिला
    मान लो तुम भी हमें कुछ यार अनजाने कभी

    हो गई नज़दीक दुनिया लोग सब कहने लगे
    दूर लेकिन क्यों हुए जो थे न बेगाने कभी

    कौन हो तुम पूछते हैं लोग हमसे जब कहीं
    क्या कहें जब ख़ुद हमीं ख़ुद को न पहचाने कभी

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  15. हर आदमी दिखा कुछ बीमार आदमी
    जाने न आदमी के किरदार आदमी

    दे अम्न की दुहाई तलवार आदमी
    है बर्फ़ एक पल में अंगार आदमी

    हैवान भी न पूरा इनसान भी नहीं
    हो जाए रहमदिल भी ख़ूँख़्वार आदमी

    ताज़ा दिखाई देता बनकर ख़बर नई
    अन्दर वही पुराना अख़बार आदमी

    बेचे ज़मीर को ख़ुद हर दिन बिना डरे
    रंगीन माल फीका बाज़ार आदमी

    मेहमान जानता सब रह जायेगा यहीं
    पत्थर के चाह्ता घर दीवार आदमी

    मिट्टी को बाँटने से इनसान क्यों बँटें
    बन जाये क्यों दिलों में दीवार आदमी

    सब जाम ज़िंदगी का पीकर यही कहें
    बेकार ज़िंदगी है बेकार आदमी

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  16. "Amigos são como o vento: às vezes perto, outras longe, mas eternos em nossos corações"

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  17. Sempre é um bom dia quando temos em nossos corações a alegria de ter alguém, para amar em Cristo Jesus.

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  18. Bom dia!
    "Que seu coração seja povoado de bons sentimentos.
    Que cada novo dia seja uma nova chance de recomeçar!
    Que você seja feliz."
    Beijo no seu coração!...
    adoro vç...
    feliz 2011...

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  19. *Kabhi Rulaayein, Kabhi Hasaayein
    Prabhu Ki Leela Prabhu Hi Jaane,
    Kabhi Bhayanak Yudh Ladein
    Kabhi Bhakton Ke Dukh Dur Karein

    Gita Gyan Dilaaya Aur Mahabharat Hua Samaapt
    Laute Tab Balram Ke Sang Dwarika Dwarikanaath
    Pehle Pehle Kya Karte Hai Prabhu Dwarika Aake,
    Jagad-Pita Khud Maat-Pita Ki Ashish Lene Jaate

    Bade Pyar Se Woh Vasudev Ke Charnon Sis Jhukaaye
    Aur Vasudev Shri Vaasudev Ko Liye Gale Se Lagaaye
    Maat Devaki Krishna Ko Dekhe Hriday Liye Lagaai
    Makhan Mishri Mahaprabhu Ko Haath Se Apne Khilaai

    Ajab Nirala Dhrishya Ye Bhakton, Dekho Jagad Ke Data
    Geeta Gyan Dilaake Phir, Maiya Ka Dil Behlaata

    Bada Hua Hai Beta Aapka Boli Rukmini Rani
    Haskar Chede Prabhu Ko Par Maa Ki Mamta Pehchaani
    Bachpan Bhar Nahi Dekha Maa Ne Toh Ab Prem Lutaaye
    Nirmal Prem Maiya Ka Paakar Prabhu Ko Anand Aaye

    Bade Bhai Balram Hai Kehte Baat Meri Sun Maai
    Saara Pyaar Kanhaiya Ko Deti Mere Liye Kya Bachaai
    Haath Mein Haath Liye Beton Ka Nainan Neer Bhare
    Pyar Mein Tab Vasudev Pita Balram Se Kehne Lage

    Hum Dono Chahe Jitna Bhi Mamta Prem Lutaayen
    Woh Vastu Toh Aisi Hai Kabhi Kam Na Hone Paayen

    Devaki Boli Sach Hai Beta Baat Jo Kehte Baba
    Waise Bhi Hirday Mein Hamare Prem Pada Hai Zyaada
    Tum Dono Ke Aane Se Pehle Bichhad Gaye Tere Bhai
    Unke Bhagya Ki Mamta Bhi Tum Dono Par Barsaai

    Devaki Aur Vasudev Ki Ankhiyan Ashru Se Bhar Aaye
    Guzara Kal Itna Dukhdaai Ab Tak Yaad Rulaaye

    Kanha Ke Avtaar Samay Woh Base The Karagaar
    Ankhiyan Aage Aankh Ke Taare Kans Ne Daale Maar
    Bal Samay Shri Krishna Kanhaai Bhi Rehte The Dur
    Putra Viyog Ke Dukh Mein Bichaare Maat Pita Majboor

    Bhakton Ke Aasoon Kabhi Sahe Nahi Sakte Hai Bhagwan
    Karuna Mein Rachte Hai Kaisi Leela Karuna Nidhaan

    Ab Mat Rona Maiya Baba, Pal Mein Vaapas Aata Hoon
    Jaise Guru Ke Khaatir Kinha, Baalak Aapke Laata Hoon
    Tat Kshan Hi Paatal Chale Balram Aur Krishna Kanhaai
    Raja Bali Se Bhet Huyi Aur Saari Katha Sunaai
    Vaastav Mein Yeh Chhe Hai Devta Muni Ke Shraap Ke Maare
    Unko Mukti Dilaani Thi Maa Devaki Ke Sahaare

    Janam Samay Jo Doodh Piya Toh Hua Woh Mahaprashad
    Us Hi Ke Dwaara Milegi Mukti Mere Bhaiyon Ko Aaj
    Bali Raaj Phir Un Sabko Hai Baalak Roop Mein Laate
    Maat Pita Se Aathon Bhai Saath Mein Milne Jaate

    Madhur Milan Ye Bhaya Bada, Sabki Aankhon Mein Paani,
    Dheere Se Phir Bhagavan Se Yeh Pooche Rukmini Rani
    Yeh Toh Hai Tere Pyaare Prabhu Phir Dinhe Dukhde Kaahe
    Sabse Pyaare Bhakt Mere Hai Tabhi Toh Dukh Seh Paaye

    Maine Har Dukh Mein Saath Diya Aur Di Sehne Ki Shakti
    Inko Dekh Ke Seekhega Jag Kya Hoti Hai Bhakti

    Sachhe Bhakt Mere Hai Aise
    Devaki Aur Vasudev Ke Jaise
    Dukh Sehkar Vishwaas Na Haare
    Tabhi Toh Pragate Unke Dwaare

    Devaki Aur Vasudev Sam, Bhakti Ke Adarsh
    Bhagvat Mahapuran Mein Hi Dete Hai Darsh
    Sukh Mein Dukh Mein Karte Rahe, Tera Hi Gungaan
    Humko Bhi Prabhu Dedo Aisi Bhakti Ka Vardaan

    Maat Pita Phir Gad Gad Hokar Prabhu Ke Charan Gire
    Rokar Unka Dhanyavaad Woh Dono Karne Lage

    Jagadpita Khud Beta Bankar Paas Hamare Aaye
    Yehi Nahi, Jeevan Ke Sab Dukh Sukh Mein Badal Kar Laaye
    Aisi Bhent Wohi De Sakta Jo Hai Jeevan Data
    Tum Ho Laal Hamare Kanha Yaan Ho Hamre Maat Pita
    Prem Kare Jinse Govinda Gopala Madhusudhan
    Unke Bhaagya Mein Hi Hoti Aisi Meethi Uljhan

    Kanha Ne Tab Unhe Uthaaya Kiya Bada Sanmaan
    Charan Nahin, Hirday Mein Mere Aap Dono Ka Sthaan
    Chaahe Mujhe Tum Beta Kaho Chaahe Kehdo Bhagwaan
    Main Tera Aur Tum Ho Mere Param Satya Yehi Jaan

    Shri Krishna Ki Aisi Hai Leela
    Bhakton Ka Jeevan Banaate Rangeela
    Kaatke Moh Maya Ke Bandhan
    Khud Se Unko Jodte Mohan
    Unke Naam Se Naam Milaakar
    Kehlaate Hai Devakinandan
    Jai Ho Teri Devakinandan
    Jai Ho Teri Devakinandan

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  20. Boa tarde!
    Sábio é aquele que ouve antes de falar,
    que sorri antes de chorar,
    que permanece quieto para sentir
    o frescor da brisa do seu interior.
    Beijos!

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  21. मन किसी का दर्द से बोझल न हो
    आँसुओं से भीगता काजल न हो

    प्यासी धरती के लिए गर जल नहीं
    राम जी ऐसा भी तो बादल न हो

    हो भले ही कुछ न कुछ नाराज़गी
    दोस्तों के बीच कलकल न हो

    ये नहीं मुमकिन कि वो आएँ इधर
    और इस दिल में कोई हलचल न हो

    धूप में राही को छाया चाहिए
    पेड़ पर कोई भले ही फल न हो

    आया है तो बन के जीवन का रहे
    ख्वाब की मानिंद सुख ओझल न हो

    जा रहे हो झील की गहराई में
    और कहते हो कहीं दलदल न हो

    पूछकर आती नहीं कोई बला
    इतना भी खुशियों पे तू पागल न हो

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  22. बीत चली संध्‍या की वेला!

    धुंधली प्रति पल पड़नेवाली
    एक रेख में सिमटी लाली
    कहती है, समाप्‍त होता है सतरंगे बादल का मेला!
    बीत चली संध्‍या की वेला!

    नभ में कुछ द्युतिहीन सितारे
    मांग रहे हैं हाथ पसारे-
    'रजनी आए, रवि किरणों से हमने है दिन भर दुख झेला!
    बीत चली संध्‍या की वेला!

    अंतरिक्ष में आकुल-आतुर,
    कभी इधर उड़, कभी उधर उड़,
    पंथ नीड़ का खोज रहा है पिछड़ा पंछी एक- अकेला!
    बीत चली संध्‍या की वेला!

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  23. ग़ैर को अपना बनाकर देख लो

    ग़ैर को अपना बनाकर देख लो
    कुछ हमें भी आज़माकर देख लो

    तुम बसाओगे न आँखों में हमें
    पर ज़रा दिल में बसाकर देख लो

    दिन ख़यालों में बिताते हो सदा
    रात आँखों में बिताकर देख लो

    तर हुई आँखें ख़ुशी में किस लिए
    फूल से शबनम उठाकर देख लो

    राज़ चेहरे से प्रकट हो जायेगा
    यों छुपाने को छुपाकर देख लो

    कल भले घुत कर तुम्हें मरना पड़े
    आज थोड़ा गुनगुनाकर देख लो

    ज़िंदगी के साथ क्या-क्या दफ़्न है
    वक़्त के पत्थर हटाकर देख लो

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  24. हजारों सरहदों की बेड़ियां लिपटीं हैं पैरों में

    हमारे पांव को भी पर बना देता तो अच्छा था

    परिन्दों ने कभी रोका नहीं रस्ता परिन्दों का

    खुदा दुनिया को चिड़ियाघर बना देता तो अच्छा था

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  25. Anjo!
    "Dentro de você estão seus sonhos, seu
    entusiasmo, seus desejos e suas alegrias.
    Dentro de você está um mundo inteiro e
    também o poder de alcançar, hoje,
    a sua felicidade!"Beijinhos carinhosos
    no seu coração!
    Linda Manhã Anjo Amigo!

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  26. Teimosa sei que sou e quero ver Alguém me desviar do que pretendo! Eu quero conhecer-me pelo avesso, Se queres impedir, eu não te atendo. Há coisas por que luto até o fim: O rosto de um poema desenhado; A música que busco e me afino; E teimo até um dia ser tocada. Teimosa sou quando uma estrela quero Nem que seja fujona ou apague o brilho. Um dia acenderá, e eu a espero. E teimo quando penso ter razão, Do fato... Ah, ninguém me desobriga! Não caio feito folhas pelo chão! (DA) CARINHOS MIL

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  27. जिंदगी जबतक रहेगी फुरशत ना होगी काम से I
    कुछ समय एसा निकालो प्रेम करलो महाकाल से II

    जन्म दिवस आ रहा महाकाल का सौ साल में I
    अभी कर लो काम उनका, पछताओगे बाद में II

    महाप्रयाण का दिन विशेष है ,महाशक्ति का आवाहन करती I
    जनम शातब्दी वर्ष निकट है ,आज हमको कमर है कसनी II

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  28. जो बात अनुचित है, उसे हृदय में अनुचित ही मानिये । आप इसका त्याग नहीं कर पा रहे हैं, यह दूसरी बात है ।चूँकि हम बीमार हैं, इसलिए बीमारी अच्छी चीज है, यह मानना य खुद समझना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। मनुष्य भूलों, कमजोरियों और बीमारियों से मुक्त नहीं है, आप भी उनसे मुक्त नहीं हैं । हमें अपनी कमजोरियों को समझना चाहिए और उनके विरुद्ध विद्रोह जारी रखना चाहिए, चाहे वह विद्रोह कितना भी मन्द क्यों न हो । जो बुराई है, उसे बुराई ही समझना चाहिए और उसके विरुद्ध लड़ाई जारी रखनी चहिए ।

    - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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  29. आत्मीय परिजनों,

    जिस प्रकार ईश्वर की महान कृतियों को देखकर ही उसकी गारिमा का अनुमान लगाया जाता
    है, उसी प्रकार हमारा कर्तव्य पोला था या ठोस- यह अनुमान उन लोगों की परख करके
    लगाया जाएगा, जो हमारे श्रद्धालु एवं अनुयायी कहे जाते हैं । यदि वाचालता भर के
    प्रशंसक और दण्डवत प्रणाम भर के श्रद्धालु रहे, तो माना जाएगा कि सब कुछ पोला रहा ।
    असलियत कर्म में सन्निहित है । वास्तविकता की परख क्रिया से होती है ।
    यदि अपने गायत्री परिवार की क्रिया पद्धति का स्तर दूसरे अन्य नर-पशुओं जैसा ही बना
    रहा तो हमें स्वयं अपने श्रम और विश्वास की निरर्थकता पर कष्ट होगा और लोगों की
    दृष्टि में उपहासास्पद बनना पड़ेगा ।

    - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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  30. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुवरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ( यजुर्वेद - ३६.३)

    भावार्थ - उस प्राण स्वरुप, दुःख नाशक, सुख स्वरुप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक , देव स्वरुप परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें | वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें |

    गायत्री महाविज्ञान भाग १
    महात्मा गाँधी कहते हैं - 'गायत्री मंत्र का निरंतर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्मा की उन्नति करने के लिए उपयोगी है | गायत्री का स्थिर चित्त और शांत ह्रदय से किया हुआ जप आपत्तिकाल में संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है |'

    स्वामी रामकृष्ण परमहंस का उपदेश है - ' मैं लोगो से कहता हूँ कि लम्बी साधना करने कि उतनी आवश्यकता नहीं है | इस छोटी-सी गायत्री साधना करके देखो | गायत्री का जप करने से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती हैं | यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति बड़ी भारी है |'

    महर्षि रमण का उपदेश है - ' योग विद्या के अंतर्गत मंत्र विद्या बड़ी प्रबल है | मंत्रों की शक्ति से अद्भुत सफलताएं मिलती हैं | गायत्री ऐसा मंत्र है, जिससे आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं |'

    स्वामी शिवानन्दजी कहते हैं - ' ब्राह्ममुहूर्त में गायत्री का जप करने से चित्त शुद्ध होता है और ह्रदय में निर्मलता आती है | शरीर निरोग रहता है, स्वभाव में नम्रता आती है, बुद्धि शुद्ध होने से दूरदर्शिता बढ़ती है और स्मरण शक्ति का विकास होता है | कठिन प्रसंगों में गायत्री द्वारा दैवी सहायता मिलती है | उसके द्वारा आत्मदर्शन हो सकता है |'

    अक्षर -- ग्रंथि का नाम -- उसमें भरी हुई शक्ति

    १. तत् ---- तापिनी ---- सफलता
    २.स ----- सफला ------ पराक्रम
    ३.वि ----- विश्वा ------- पालन
    ४.तुर् ----- तुष्टि ------- कल्याण
    ५. व ------ वरदा ------ योग
    ६. रे ------ रेवती ------- प्रेम
    ७. णि------ सूक्ष्मा ------ धन
    ८. यं------- ज्ञाना ------- तेज
    ९. भर्------ भर्गा ------- रक्षा
    १०. गो------ गोमती------ बुद्धि
    ११. दे------- देविका------ दमन
    १२. व------ वाराही------- निष्ठा
    १३. स्य------सिंहनी------ धारणा
    १४. धि----- ध्याना------ प्राण
    १५. म------ मर्यादा------ संयम
    १६. हि------ स्फुटा------- तप
    १७. धि------ मेधा------- दूरदर्शिता
    १८. यो------ योगमाया---- जागृति
    १९. यो------ योगिनी----- उत्पादन
    २०. नः ----- धारिणी ---- सरसता
    २१. प्र ------ प्रभवा ----- आदर्श
    २२. चो ----- उष्मा ----- साहस
    २३. द ------ दृश्या ----- विवेक
    २४. यात् ---- निरंजना --- सेवा

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  31. Jesus te ama muito,eu também!!
    Talvez hoje seu coração está apertado, dolorido, triste,
    Desejou algo e não realizou, esperando algo e não aconteceu,
    Pensou que no seu dia nada aconteceu, não sente suas forças, para falar, para lutar, orar e até mesmo chorar, mas seu coração por dentro grita por socorro,
    talvez você não queria ouvir ninguem, mas gostaria de desabafar,
    eu posso dizer que mesmo a tanta angustia você não está sozinho,
    você tem uma amigo, este tem o nome de JESUS CRISTO,
    se você não está na luz, Ele te guiará,
    se está sozinho, Ele será seu Consolador, se está sem forças, Ele renovará suas forças,
    se você não consegue falar uma palavra se quer, creia que Ele entenderá sua lágrima,
    pois Ele sonda nossos corações, Ele conhece nossos pensamentos antes de chegar a nós,
    você só precisa permitir Ele entrar no seu coração, e entregar completamente sua vida,
    dizendo a Ele que deseja ser totalmente dependente do amor de Deus.
    Você é muito especial, Jesus te ama muito...bjs..

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  32. सच के लिबास में दिखाई देना।
    और पेशा है झूठी सफाई देना।

    यूं चीखने से बात नहीं बनती,
    मायने रखता है सुनाई देना।

    लाद गया वो किताबों के भारी बस्ते,
    मैने कहा था बच्चों को पढ़ाई देना।

    जो दर्द दिए तूने उसका हिसाब कर,
    फिर मुझे नए साल की बधाई देना।

    कितना अच्छा है पत्त्थर पूजने से,
    बीमार ग़रीबों को दवाई देना।

    परिंदो का पिजरे में लौट आना है अलग,
    अलग बात है उन्हें पिंजरे से रिहाई देना।

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  33. Boa noite!

    Sabe que horas são?
    Hora que deu Saudade!
    Hora de enviar Recados!
    Hora de lembrar dos Amigos!
    Hora de mandar Aquele Abraço!
    Hora de Dizer...
    Você é Muito Especial!
    Muita Paz!
    Super Beijo.

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  34. मुश्कीलो को करता जो आशन है | वो असल मे ही तो एक इन्सान है
    गम से घबराकर के जो हिम्मत छोड दे | बुजदिली की वही तो पहचान है
    जिन्दगी है एक दरिया दर्द का | दर्द से खेले वही तो इन्सान है
    खुशाली मे सब यहां जी लेते है | गम मे जीना तो अलग एक शान है
    हम बना सकते है खुद तकदीर को | गम हमी मे जोश का एलान है
    कहते हे यह वक्त है एक धुप छाओ | फिर भला क्यों आदमी हैरान है
    खुद को जो समजे की हम कमजोर है| वह तो बहुत नादन है अन्जान है

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  35. "दिन हुआ है तो रात भी होगी
    हो मत उदास कभी तो बात भी होगी
    इतने प्यार से दोस्ती की है खुदा की कसम
    जिंदगी रही तो मुलाकात भी होगी
    कोशिश कीजिए हमें याद करने की
    लम्हे तो अपने आप ही मिल जायेंगे
    तमन्ना कीजिए हमें मिलने की
    बहाने तो अपने आप ही मिल जायेंगे
    महक दोस्ती की इश्क से कम नहीं होती
    इश्क से ज़िन्दगी ख़तम नहीं होती
    अगर साथ हो ज़िन्दगी में अच्छे दोस्त का
    तो ज़िन्दगी जन्नत से कम नहीं होती

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  36. माँ तेरे बिना जी नहीं लगता है
    तेरी गोदी मे खो जाऊ दिल करता है

    साथ रहती है तू तो लड़ लेता हूँ सबसे
    जब दूर रहती है , तो डर लगता है


    जाने कितने है निशान जख्मो के इस जिस्म पर
    पर जिन्दा हूँ अब तलक ,तेरी दुआओ का असर लगता है

    तेरे दिखाए हुए रास्तो का ही सबब है
    जो आस्मा अब धुला धुला सा लगता है

    तू खिला देती थी कई रोटिया अपने नरम हाथो से
    अब ठंडा रहता है चूल्हा , पर पेट भरा सा लगता हँ

    तू डांटती थी बिस्तर पर फैला सामान देखकर
    अब तू नहीं हँ तो सारा घर बिखरा सा लगता है

    तू जगाती थी मुझको एक नई सुबह लेकर
    अब उठता हूँ तो रोज की तरह पुराना सवेरा लगता है

    जिस मंदिर मे तू सोते उठते ही जलाती थी चिराग
    अब देखता हूँ तो वो कभी कभार ही रोशन लगता है

    जिस घर को तू सजाती थी बड़े जतन से
    अब वो घर चिडियों का बसेरा लगता है

    तूने ही सिखाया है लड़खड़ाते हुए कदमो को चलना
    अब भले रास्ते टेढ़े मेढ़े है , पर नितीश सीधे चलता

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  37. Mom does not seem to live without you
    Does your heart go missing in the dock

    So you can fight is with the
    When you are away, the fear


    The body on how to trail Jkmo
    Now live on divorce, you feel the effect of Duao

    Cause of the paths you have shown
    Asma, who is now a bit washed washed

    You would feed many breads of your soft hands
    Hearth is cold now, but the full feeling it uh

    Used to scold you see stuff on the bed spread
    Will not you feel like the whole family is now scattered

    You did inspire me with a new day
    So now get up every morning feels like the old

    The lamp was lit in the temple attack you sleep
    I see now she is rarely illuminating

    The house was a remark-ably well you Sjati
    She is now a nest of birds

    Did you have taught it to walk feet staggered
    Rams perverse way it is now, runs directly on the Nitish

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  38. Mãe não parecem viver sem você
    O seu coração vão faltar no banco dos réus

    Então você pode lutar é com o
    Quando você estiver longe, o medo


    O corpo sobre a forma de trilha Jkmo
    Agora vivem sobre o divórcio, você sente o efeito da Duao

    Causa dos caminhos que você tem mostrado
    Asma, que agora está um pouco lavada lavada

    Você daria para alimentar muitos pães de suas mãos macias
    Hearth está frio agora, mas a sensação de cheio, uh

    Usados ​​para repreender você vê coisas na cama propagação
    Você não vai se sentir como toda a família está agora espalhada

    Você me inspirou com um novo dia
    Portanto, agora se levantar todas as manhãs se sente como o velho

    A lâmpada foi acesa no ataque templo você dorme
    Vejo agora que ela raramente é esclarecedora

    A casa era uma observação bem-mente você Sjati
    Ela agora é um ninho de pássaros

    Será que você tem ensinado a andar pé escalonados
    Ram maneira perversa é agora, é executado diretamente sobre o Nitish

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  39. That true friendships continue.
    What are a few tears, and shared.
    What joys are always present
    and are celebrated by all.
    That affection is present in a simple hello, or any other phrase you typed it quickly.
    Hearts are always open to new friendships, new loves, new conquests.
    God is always with his hand outstretched pointing the right way.
    Little things like envy or dislike, be removed from our lives.
    That those who need help may always find in us an encouraging word friend.
    That truth is always paramount.
    That forgiveness and understanding to overcome the bitterness and dissension.
    Let this be our little virtual world more human.
    Everything we dream a reality.
    That love for others is our ultimate goal.
    May our journey today is full of flowers.
    That momentary happiness of Vengeance, sag and...

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  40. रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार, और अगर हो भी
    तो किस उम्मीद पे कहिए के आरज़ू क्या है ?
    -----------------------------------------------------------------------

    वो चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
    सिवाय बादा-ए-गुल-फाम-ए-मुश्कबू क्या है ?
    -------------------------------------------------------------------------
    रगों में दौड्ते फिरने के हम नहीं क़ायल
    जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है ?
    ----------------------------------------------------------------------------
    जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
    कुरेदते हो जो अब राख, जूस्तजू क्या है ?
    --------------------------------------------------------------------------------
    हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है ?
    तुम्हीं कहो के ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है ?

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  41. Hey, digo a vocês amigos!

    Escondidos em Arman do Coração
    Hey, digo a vocês amigos!

    Nah No No No SEZ
    Não é um Pajeb prata
    Lua noite louca
    Não o material dos sonhos
    O chinking das folhas sob
    Qual a batida - Passion no coração dissolvido
    Hey, digo a vocês amigos!

    Eu posso dizer que não há linguagem
    Não fogo - ah, eu pensei que o co-
    Este bit respiração grandes perplexos
    Sbdhin em torno de um pouco distraído
    O arco-íris e ampliado
    Algum lugar ele cresceu
    Hey, digo a vocês amigos!

    Escondidos em Arman do Coração
    Hey, digo a vocês amigos!

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  42. Velho louco nunca sabia
    Ao pensar sobre licenças de queima nunca foram

    Ele estava muito certo de mão em mão nos
    Nunca se sabe o que vai cortar a mão luvas

    Pássaro com fome aqui embaixo para sempre
    Não que eles nunca parecem malha com o grão

    Afinal, ele diz que temos de esquecer
    Mas o homem nunca vai esquecer Afsane
    Você não pode considerar Tkhdir queixas
    Suponha que você um pouco de amor, às vezes inadvertidamente

    Tornou-se perto de todas as pessoas dizendo que o mundo
    Mas por que nunca o alienígena não foi afastado

    Quando você perguntar quem são as pessoas ao nosso redor
    O que dizem que você nunca se identificou ou se HMIN

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  43. Velho louco nunca sabia
    Ao pensar sobre licenças de queima nunca foram

    Ele estava muito certo de mão em mão nos
    Luva mão nunca soube o que iria cancelar

    Sempre com fome ave desceu
    Não que eles nunca parecem malha com o grão

    Afinal, ele diz que temos de esquecer
    Afsane homem Mas nunca vai esquecer
    Você não pode acreditar gila Tkhdir
    Suponha que você homem que alguma vez, inadvertidamente,

    Pessoas próximas de se tornar o mundo todo dizendo
    Mas por que nunca foram, não estranha o estado fora

    Quando você perguntar às pessoas ao nosso redor que
    O que dizem que você nunca não HMIN própria reconhecer-se

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  44. जलते हुए जंगल से गुज़रना था हमें भी
    फिर बर्फ़ के सहरा में ठहरना था हमें भी

    मेयार नवाज़ी में कहाँ उसको सुकूँ था
    उस शोख़ की नज़रों से उतरना था हमें भी

    जाँ बख़्श था पल भर के लिए लम्स किसी का
    फिर कर्ब के दरिया में उतरना था हमें भी

    यारों की नज़र ही में न थे पंख हमारे
    खुद अपनी उड़ानों को कतरना था हमें भी

    वो शहद में डूबा हुआ, लहजा, वो तखातुब
    इखलास के वो रंग, कि डरना था हमें भी

    सोने के हिंडोले में वो खुशपोश मगन था
    मौसम भी सुहाना था, सँवरना था हमें भी

    हर फूल पे उस शख़्स को पत्थर थे चलाने
    अश्कों से हर इक बर्ग को भरना था हमें भी

    उसको था बहुत नाज़ ख़दो ख़ाल पे 'अंबर'
    इक रोज़ तहे-ख़ाक बिखरना था हमें भी

    चार

    फिर उस घाट से ख़ुश्बू ने बुलावे भेजे
    मेरी आँखों ने भी ख़ुशआब नगीने भेजे

    मुद्दतों, उसने कई चाँद उतारे मुझमें
    क्या हुआ? उसने जो इक रोज़ धुंधलके भेजे

    मैंने भी उसको कई ज़ख़्म दिए दानिस्ता
    फिर तो उसने मेरी हर सांस को गजरे भेजे

    मैं तो उस दश्त को चमकाने गया था, उसने
    बेसबब, मेरे तआक़ुब में उजाले भेजे

    चाँद निकलेगा तो उछलेगा समंदर का लहू
    धुंध की ओट से उसने भी इशारे भेजे

    मोर ही मोर थे हर शाख पे संदल की मगर
    ढूँढ़ने साँप वहाँ, उसने सपेरे भेजे

    मेरी वादी में वहीं सूर्ख़ बगूले हैं अभी
    मैंने इस बार भी सावन को क़सीदे भेजे

    दस्तोपा कौनसे 'अंबर' वो मशक़्क़त कैसी
    उसकी रहमत, कि मुझे सब्ज़ नवाले भेजे

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  45. पलाशों के सभी पल्लू हवा में उड़ रहे होंगे
    मगर इस बार, बंजारे, सुना है ऊँघते होंगे

    उसे भी आख़िरश मेरी तरह हँसना पड़ा अब के
    उसे भी था यकीं, उस दश्त में हीरे पड़े होंगे

    मुझे मालूम है इक रोज़ वो तशरीफ़ लाएगा
    मगर इस पार सारे घाट दरिया हो चुके होंगे

    हमारे सिलसिले के लोग खाली हाथ कब लौटे
    पहाड़ों से नदी इस बार फिर वो ला रहे होंगे

    वो मौसम, जब सबा के दोश पर खुशबू बिखेरेगा
    हमारी कश्तियों के बादबाँ भी खुल चुके होंगे

    वो खाली सीपियों के ढेर पर सदियों से बैठा है
    उसे, मोती, समंदर की तहों में ढूँढ़ते होंगे

    सियह शब तेज़ बारिश और सहमी-सी फ़िज़ा में भी
    बये के घोंसले में चंद जुगनू हँस रहे होंगे

    ये क्या 'अंबर' कि वीराने में यों ख़ामोश बैठे हो
    चलो उट्ठो तुम्हारी राह बच्चे देखते होंगे

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  46. Diga a ela para ficar ciente de tudo, porque você fez uma declaração de suas ações.
    Por favor, acorde para cada ação, porque o seu trabalho torna-se o seu hábito.
    Porque você usou para acordar e ver o seu hábito todos os torna-se seu caráter.
    Tente acordar o seu personagem, porque seu personagem é sua vida.
    Em suma,
    Sua consciência é o seu sucesso.
    Acorde!

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  47. बस इतना--अब चलना होगा
    फिर अपनी-अपनी राह हमें ।

    कल ले आई थी खींच, आज
    ले चली खींचकर चाह हमें
    तुम जान न पाईं मुझे, और
    तुम मेरे लिए पहेली थीं;
    पर इसका दुख क्या? मिल न सकी
    प्रिय जब अपनी ही थाह हमें ।

    तुम मुझे भिखारी समझें थीं,
    मैंने समझा अधिकार मुझे
    तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,
    था बना वही तो प्यार मुझे ।
    तुम लोक-लाज की चेरी थीं,
    मैं अपना ही दीवाना था
    ले चलीं पराजय तुम हँसकर,
    दे चलीं विजय का भार मुझे ।

    सुख से वंचित कर गया सुमुखि,
    वह अपना ही अभिमान तुम्हें
    अभिशाप बन गया अपना ही
    अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें
    तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,
    तुम समझ न पाईं जीवन को
    जन-रव के स्वर में भूल गया
    अपने प्राणों का गान तुम्हें ।

    था प्रेम किया हमने-तुमने
    इतना कर लेना याद प्रिये,
    बस फिर कर देना वहीं क्षमा
    यह पल-भर का उन्माद प्रिये।
    फिर मिलना होगा या कि नहीं
    हँसकर तो दे लो आज विदा
    तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,
    यह मेरा आशीर्वाद प्रिये ।

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  48. “नसीबों वाले हैं, जिनके है बेटियाँ घर की लक्ष्मी है लड़की, भविष्य की आवाज़ है लड़की. सबके सिर का नाज़ है लड़की, माता-पिता का ताज है लड़की. घर भर को जन्नत बनती हैं बेटियाँ, मधुर मुस्कान से उसे सजाती है बेटियाँ. पिघलती हैं अश्क बनके माँ के दर्द से, रोते हुए बाबुल को हंसती हैं बेटियाँ. सहती हैं सारे ज़माने के दर्दों-गम, अकेले में आंसू बहती हैं बेटियाँ. आंचल से बुहारती हैं घर के सभी कांटे, आंगन में फूल खिलाती हैं बेटियाँ. सुबह की पाक अजान-सी प्यारी लगे, मंदिर के दिए” की बाती हैं बेटियाँ. जब आता है वक्त कभी इनकी विदाई का, जार-जार सबको रुलाती हैं बेटियाँ.”

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  49. अंधियारी रातों में

    अंधियारी रातों में मुझको
    थपकी देकर कभी सुलाती
    कभी प्यार से मुझे चूमती
    कभी डाँटकर पास बुलाती

    कभी आँख के आँसू मेरे
    आँचल से पोंछा करती वो
    सपनों के झूलों में अक्सर
    धीरे-धीरे मुझे झुलाती

    सब दुनिया से रूठ रपटकर
    जब मैं बेमन से सो जाता
    हौले से वो चादर खींचे
    अपने सीने मुझे लगाती

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  50. तुम्हीं मिटाओ मेरी उलझन

    तुम्ही मिटाओ मेरी उलझन
    कैसे कहूँ कि तुम कैसी हो
    कोई नहीं सृष्टि में तुम-सा
    माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।
    ब्रह्मा तो केवल रचता है
    तुम तो पालन भी करती हो
    शिव हरते तो सब हर लेते
    तुम चुन-चुन पीड़ा हरती हो
    किसे सामने खड़ा करूँ मैं
    और कहूँ फिर तुम ऐसी हो।
    माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।

    ज्ञानी बुद्ध प्रेम बिना सूखे
    सारे देव भक्ति के भूखे
    लगते हैं तेरी तुलना में
    ममता बिन सब रुखे-रुखे
    पूजा करे सताए कोई
    सब के लिए एक जैसी हो।
    माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।

    कितनी गहरी है अदभुत-सी
    तेरी यह करुणा की गागर
    जाने क्यों छोटा लगता है
    तेरे आगे करुणा-सागर
    जाकी रही भावना जैसी
    मूरत देखी तिन्ह तैसी हो।
    माँ तुम बिलकुल माँ जैसै हो।।

    मेरी लघु आकुलता से ही
    कितनी व्याकुल हो जाती हो
    मुझे तृप्त करने के सुख में
    तुम भूखी ही सो जाती हो।
    सब जग बदला मैं भी बदला
    तुम तो वैसी की वैसी हो।
    माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।

    तुम से तन मन जीवन पाया
    तुमने ही चलना सिखलाया
    पर देखो मेरी कृतघ्नता
    काम तुम्हारे कभी न आया
    क्यों करती हो क्षमा हमेशा
    तुम भी तो जाने कैसी हो।
    माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।

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  51. माँ की याद

    माँ के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई
    पंचतारा होटलों की शान शौकत कुछ न भाई
    बैरा निगोड़ा पूछ जाता किया जो मैंने कहा
    सलाम झुक-झुक करके मन में टिप का लालच रहा
    खाक छानी होटलों की चाहिए जो ना मिला
    क्रोध में हो स्नेह किसका? कल्पना से दिल हिला

    प्रेम मे नहला गई जब जम के तेरी डांट खाई
    माँ के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई

    तेरी छाया मे पला सपने बहुत देखा किए
    समृद्धि सुख की दौड़ मे दुख भरे दिन जी लिए
    महल रेती के संजोए शांति मै खोता रहा
    नींद मेरी छिन गई बस रात भर रोता रहा

    चैन पाया याद करके लोरी जो तूने सुनाई
    माँ के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई

    लाभ हानि का गणित ले ज़िंदगी की राह में
    जुट गया मित्रों से मिल प्रतियोगिता की दाह में
    भटका बहुत चकाचौंध में खोखला जीवन जिया
    अर्थ ही जीने का अर्थ, अनर्थ में डुबो दिया

    हर भूल पर ममता भरी तेरी हँसी सुकून लाई
    माँ के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई।

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  52. माँ तुम गंगाजल होती हो

    मेरी ही यादों में खोई
    अक्सर तुम पागल होती हो
    माँ तुम गंगा-जल होती हो!

    जीवन भर दुःख के पहाड़ पर
    तुम पीती आँसू के सागर
    फिर भी महकाती फूलों-सा
    मन का सूना संवत्सर

    जब-जब हम लय गति से भटकें
    तब-तब तुम मादल होती हो।

    व्रत, उत्सव, मेले की गणना
    कभी न तुम भूला करती हो
    सम्बन्धों की डोर पकड कर
    आजीवन झूला करती हो

    तुम कार्तिक की धुली चाँदनी से
    ज्यादा निर्मल होती हो।

    पल-पल जगती-सी आँखों में
    मेरी ख़ातिर स्वप्न सजाती
    अपनी उमर हमें देने को
    मंदिर में घंटियाँ बजाती

    जब-जब ये आँखें धुंधलाती
    तब-तब तुम काजल होती हो।

    हम तो नहीं भगीरथ जैसे
    कैसे सिर से कर्ज उतारें
    तुम तो ख़ुद ही गंगाजल हो
    तुमको हम किस जल से तारें

    तुझ पर फूल चढ़ाएँ कैसे
    तुम तो स्वयं कमल होती हो।

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  53. देह में जमने लगी
    बहती नदी है
    सांस लेने में लगी पूरी सदी है,
    चेतना पर धुंध छाई है
    माँ तुम्हारी याद आई है।

    हम गगन में है
    न धरती पर
    बस हवाओं में हवाएँ हैं,
    धूप की कुछ गुनगुनी किरनें,
    ये तुम्हारी ही दुआएँ हैं,
    कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं,
    किंतु मन के तार सब अवगुन रहे हैं,
    गोद में सिर रख ज़रा सो लूँ,
    फिर जनमभर रत-जगाई है।
    जंगलों से वह बचा लाई
    एक बांसती अभय देकर
    लोरियाँ हमको सुनाती है
    फिर वही रंगीन लय लेकर,
    प्यार से सिर पर रखा आँचल तुम्हारा
    मैं तभी से युद्ध कोई भी न हारा
    झूठ ने ऐसी जगाई आँच
    सच ने गर्दन झुकाई है
    माँ तुम्हारी याद आई है।

    देख तुलसी में नई कोपल
    बोझ अब उतरा मेरे सिर से
    झर रहे हैं फूल हर सिंगार
    मन हरा होने लगा फिर से
    द्वार पर शहनाइयाँ
    बजने लगी हैं,
    छोरियाँ मेहंदी रचा सजने लगी हैं,
    आज बिटिया की सगाई है
    माँ तुम्हारी याद आई है।

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  54. देह में जमने लगी
    बहती नदी है
    सांस लेने में लगी पूरी सदी है,
    चेतना पर धुंध छाई है
    माँ तुम्हारी याद आई है।

    हम गगन में है
    न धरती पर
    बस हवाओं में हवाएँ हैं,
    धूप की कुछ गुनगुनी किरनें,
    ये तुम्हारी ही दुआएँ हैं,
    कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं,
    किंतु मन के तार सब अवगुन रहे हैं,
    गोद में सिर रख ज़रा सो लूँ,
    फिर जनमभर रत-जगाई है।
    जंगलों से वह बचा लाई
    एक बांसती अभय देकर
    लोरियाँ हमको सुनाती है
    फिर वही रंगीन लय लेकर,
    प्यार से सिर पर रखा आँचल तुम्हारा
    मैं तभी से युद्ध कोई भी न हारा
    झूठ ने ऐसी जगाई आँच
    सच ने गर्दन झुकाई है
    माँ तुम्हारी याद आई है।

    देख तुलसी में नई कोपल
    बोझ अब उतरा मेरे सिर से
    झर रहे हैं फूल हर सिंगार
    मन हरा होने लगा फिर से
    द्वार पर शहनाइयाँ
    बजने लगी हैं,
    छोरियाँ मेहंदी रचा सजने लगी हैं,
    आज बिटिया की सगाई है
    माँ तुम्हारी याद आई है।

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  55. वो है मेरी माँ

    मेरे सर्वस्व की पहचान
    अपने आँचल की दे छाँव
    ममता की वो लोरी गाती
    मेरे सपनों को सहलाती
    गाती रहती, मुस्कराती जो
    वो है मेरी माँ।

    प्यार समेटे सीने में जो
    सागर सारा अश्कों में जो
    हर आहट पर मुड़ आती जो
    वो है मेरी माँ।

    दुख मेरे को समेट जाती
    सुख की खुशबू बिखेर जाती
    ममता की रस बरसाती जो
    वो है मेरी माँ।

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  56. माँ की ममता

    जन्म दात्री
    ममता की पवित्र मूर्ति
    रक्त कणो से अभिसिंचित कर
    नव पुष्प खिलाती

    स्नेह निर्झर झरता
    माँ की मृदु लोरी से
    हर पल अंक से चिपटाए
    उर्जा भरती प्राणो में
    विकसित होती पंखुडिया
    ममता की छावो में

    सब कुछ न्यौछावर
    उस ममता की वेदी पर
    जिसके
    आँचल की साया में
    हर सुख का सागर!

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  57. इंशा जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
    वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या

    इस दिल के दरीदां दामन को देखो तो सही सोचो तो सही
    जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली का फैलाना क्या

    शब बीती चाँद भी डूब चला जंज़ीर पड़ी दरवाजे. में
    क्यों देर गये घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या

    फिर हिज्र की लंबी रात मियां संजोग की तो यही एक घड़ी
    जो दिल में है लब पर आने दो शरमाना क्या घबराना क्या

    उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख्वाब का आलम लगता है
    उस रोज़ जो उनसे बात हुई वो बात भी थी अफसाना क्या

    उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें
    जिसे देख सकें पर छू न सकें वह दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या

    उसको भी जला दुखते हुए मन एक शोला लाल भभूका बन
    यूं आंसू बन बह जाना क्या यूँ माटी में मिल जाना क्या

    जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यों बन में न जा बिसराम करें
    दीवानों की सी ना बात करे तो और करे दीवाना क्या

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  58. अपनी धरती के साथ रहता हूँ
    इसके सब धूप-ताप सहता हूँ

    पूस जैसा कभी ठिठुरता हूँ
    और कभी जेठ जैसा दहता हूँ

    सब परिंदों के साथ उड़ता हूँ
    सारी नदियों के साथ बहता हूँ

    जागता हूँ सुबह को सूरज सा
    शाम को खण्डहर सा ढहता हूँ

    इसमें तुम भी हो और ज़माना भी
    यूँ तो मैं अपनी बात कहता हूँ

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  59. दुखों से दोस्ताना हो गया है
    तुम्हें देखे ज़माना हो गया है

    खिलौनों के लिए रोता नहीं है
    मेरा बेटा सयाना हो गया है

    भरी महफ़िल में सच कहने लगा है
    इसे रोको, दीवाना हो गया है

    मुखौटा इक नया ला दो कहीं से
    मेरा चेहरा पुराना हो गया है

    कभी संकेत में कुछ कह दिया था
    उसी का अब फ़साना हो गया है

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  60. तेरी ज़िद, घर-बार निहारूँ,
    मन बोले संसार निहारूँ।

    पानी, धूप, अनाज जुटा लूँ,
    फिर तेरा सिंगार निहारूँ।

    दाल खदकती, सिकती रोटी,
    इनमें ही करतार निहारूँ।

    बचपन की निर्दोष हँसी को,
    एक नहीं, सौ बार निहारूँ।

    तेज़ धार औ भँवर न देखूँ,
    मैं नदिया के पार निहारूँ।

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  61. सिमटने की हक़ीक़त साथ में विस्तार का सपना,
    खुली आँखों से सब देखा किए बाज़ार का सपना।

    समंदर के अंधेरों में हुईं गुम कश्तियाँ कितनी,
    मगर डूबा नहीं है-उस तरफ़, उस पार का सपना।

    थकूँ तो झाँकता हूँ उधमी बच्चों की आँखों में,
    वहाँ ज़िंदा है अब तक ज़िन्दगी का, प्यार का सपना।

    जो रोटी के झमेलों से मिली फ़ुरसत तो देखेंगे
    किसी दिन हम भी ज़ुल्फ़ों का, लब-ओ-रुख़सार का सपना।

    जुनूं है, जोश है, या हौसला है; क्या कहें इसको!
    थके-माँदे कदम और आँख में रफ़्तार का सपना।

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  62. कहानी दर्द की मैं ज़िन्दगी से क्या कहता
    ये दर्द उसने दिया है उसी से क्या कहता।

    गिला तो मुझको भी करना था प्यास का लेकिन
    जो ख़ुद ही सूख गई उस नदी से क्या कहता।

    मैं जानता हूं लहू सब का एक होता है
    जो खू.ं बहाता है उस आदमी से क्या कहता।

    मेरे अज़ीज़ ही मुझ को समझ न पाए हैं
    मैं अपना हाल किसी अजनबी से क्या कहता।

    तमाम शहर में झूठों का राज है 'अख्.तर'
    मैं अपने ग़म की हक़ीकत किसी से क्या कहता।

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  63. फिर किसी आवाज़ ने इस बार पुकारा मुझको
    खौफ और र्दद ने क्योंकर यूँ झिंझोड़ा मुझको
    मैं तो सोया हुआ था खाक़ के उस बिस्तर पर
    जिस पर हर जिस्म नयीं ज़िन्दगी ले लेता है
    बस ख्.यालों में नहीं अस्ल में सो लेता है
    ऑख खुलते ही एक मौत का मातम देखा
    अपने ही शहर में दहशत भरा आलम देखा

    किस क़दर खौफ़ ज़दा चीख़ की आवाज़ थी वो
    बूढी .बेवा की दम तोड़ती औलाद थी वो
    एक बिलख़ते हुये मासूम की किलकार थी वो
    कुछ यतीमों की सिसकती हुई फ़रियाद थी वो

    मुझको याद आया फिर एक बार वो बचपन मेरा
    कुहर की धॅुंंध में लिपटा हुआ सपना मेरा
    तब हम एक थे इन्सानियत की छॉव तले
    अब हम अनेक हैं हैवानियत के पॉव तले
    तब हम सोचते थे सब्ज़ और खुशहाल वतन
    अब हम देखते हैं ग़र्क और लाचार वतन
    तब फूल थे खु.शियॉ थीं और हम सब थे
    अब भूख है ग़मगीरी और हम या तुम
    तब तो जीते थे हम और तुम हम सबके लिये
    अब तो मरते हैं हम और तुम र्सिफ़ अपने लिये

    अब न वो इनसान रहा और न वो भगवान रहा
    बस दूर ही दूर तक फैला हुआ हैवान रहा

    देख लो सोचलो शायद तुम सम्भल पाओगे
    रूह और जिस्म के रिश्तों को समझ पाओगे
    क्यों जुदा करते हो रूह से जिस्म "रज़ा"
    क्या कभी इस तरह तुम चैन से सो पाओगे

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  64. फ़सादो दर्द और दहशत में जीना
    मिला यह आदमी को आदमी से

    बुरा कहते हैं हम क्यों क़िस्मतों को
    बढ़ी हैं रंजिशे अपनी कमी से

    वतन ऐसा जलाया बिजलियों ने
    सहम जाते हैं अब हम रोशनी से

    जहाँ गुज़रा था एक बचपन सुहाना
    वो दर छूटा है कितनी बेदिली से

    न जब कोई तुम्हारे पास होगा
    बहुत पछताओगे मेरी कमी से

    कभी तो यह हकीक़त मान लोगे
    तुम्हें चाहा है मैंने सादगी से

    हुईं सब ग़र्क वो ख्वाहिश 'रज़ा' की
    सुनाऐं क्या तुम्हें अपनी खुशी से

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  65. फिर तेज़ हवा का यह झोंका सावन की याद दिलाता है
    शायद तुमने फिर याद किया चिठ्ठी का रंग बतलाता है

    शायद अमिया के पेडों पर फिर बौर नया लग आया हो
    कोयल की गूँजी कु कू ने हर गीत मेरा दोहराया हो
    फिर पक्षी डाल पे डोला हो हर गुन्चा गुन्चा झूला हो
    बीते बचपन की यादों में क्यों बिछड़ा पल तड़पाता है

    फिर तेज़ हवा का यह झोंका सावन की याद दिलाता है

    शायद पीपल की छावों में एक याद सताने लगती हो
    बीते बचपन की बातों में ये बात रूलाने लगती हो
    क्यों रिश्ते नाते टूट गए क्यों साथी सारे छूट गए
    किस्मत ने कैसी चाल चली क्यों हर पल तुम्हें रुलाता है

    फिर तेज़ हवा का यह झोंका सावन की याद दिलाता है

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  66. तुम चाहो, मत प्रीत जताना
    तुम चाहो, आगोश न देना
    तुम बिन यदि मैं भटक गया तो
    मुझको कोई दोष न देना।

    दुनिया भर की रीत निभाओ
    मुझसे बँधकर क्या पाओगी
    सच पूछो विश्वास नहीं कि
    मेरा दर्द बँटा पाओगी
    मैं तो कब का छोड़ चुका हूं
    लेकर नाम तेरा संसार
    मेरे साथ है जीता-मरता
    इक तेरा मुट्ठी भर प्यार
    मुझे न दुनियादारी भायी
    मुझको तुम ये होश न देना।

    मैं तो अब तक चलता आया
    तेरी सुधि की बाँह गहे
    पथिक कोई मिल जाए राह में
    साथ चल पड़े कौन कहे
    संभव है कि बिसरा दूँ मैं
    तुझ पर लिखे हुए सब गीत
    और तेरा विश्वास तोड़ दूँ
    भूले से मेरे मनमीत
    तुम्हें भुलाकर भी मैं जी लूँ
    मुझको ये संतोष न देना।

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  67. बात कुछ भली-भली सी है
    जिसको तुमने चूम लिया था उठ भिनसारे
    वह हथेली जली-जली सी है।

    गालों पर धर गए पलास
    कल थे अनुदार जो मधुमास
    कढ़ गए रूमालों पर भी
    अपने सपर्पित विश्वास
    वेदना के स्वर कैसे साधूँ
    साँस-साँस मनचली सी है।

    सहसा संघर्ष धुल गया
    मुझको उत्कर्ष मिल गया
    तुमसे पहचान हो गई
    जीवन निष्कर्ष मिल गया
    जग निष्ठुर स्वभाव से
    कामना मेरी छली सी है।

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  68. बात कुछ भली-भली सी है
    जिसको तुमने चूम लिया था उठ भिनसारे
    वह हथेली जली-जली सी है।

    गालों पर धर गए पलास
    कल थे अनुदार जो मधुमास
    कढ़ गए रूमालों पर भी
    अपने सपर्पित विश्वास
    वेदना के स्वर कैसे साधूँ
    साँस-साँस मनचली सी है।

    सहसा संघर्ष धुल गया
    मुझको उत्कर्ष मिल गया
    तुमसे पहचान हो गई
    जीवन निष्कर्ष मिल गया
    जग निष्ठुर स्वभाव से
    कामना मेरी छली सी है।

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  69. ख्व़ाब जैसा ही वाक़या होता
    तू मेरे घर जो आ गया होता

    जिन ख़तों को सँभाल कर रक्खा
    काश उनको मैं भेजता होता

    ख्व़ाब के ख्व़ाब देखने वाले
    आँख से भी तो देखता होता

    तुझको देखा तो मेरे दिल ने कहा
    मैं न होता इक आईना होता

    खुद को मैं ढूँढे से कहाँ मिलता
    गर न तुझको मैं चाहता होता

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  70. तीरगी का है सफ़र रुक जाओ
    बोले अनबोले हैं डर रुक जाओ

    तुम्हारे पास वक़्त कम हो तो
    ले लो तुम मेरी उमर रुक जाओ

    हर ओर दुकाने ही दुकानें हैं
    कोई मिल जाए जो घर रुक जाओ

    जश्न में उस तरफ़ क्यों बिखरें हैं
    किसी नन्हे परिंदे के पर रुक जाओ

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  71. बातों बातों में जो ढली होगी
    वो रात कितनी मनचली होगी

    तेरे सिरहाने याद भी मेरी
    रात भर शम्मां-सी जली होगी

    जिससे निकला है आफ़ताब मेरा
    वो तेरा घर तेरी गली होगी

    दोस्तों को पता चला होगा
    दुश्मनों-सी ही खलबली होगी

    सबने तारीफ़ तेरी की होगी
    मैं चुप रहा तो ये कमी होगी

    तेरी आँखो में झाँकने के बाद
    लड़खड़ाऊँ तो मयक़शी होगी

    है तेरा ज़िक्र तो यकीं है मुझे
    मेरे बारें में बात भी होगी

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  72. दूर हम तुमसे जा नहीं सकते
    शर्त ये भी है पा नही सकते

    किसी को अपने आँसुओं का सबब
    लाख चाहे बता नहीं सकते

    जिस पे लिक्खी है इबारत कोई
    हम वो दीवार ढा नही सकते

    उसको रिश्तों से है नफ़रत शायद
    कोई रिश्ता बना नहीं सकते

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  73. दूर हम तुमसे जा नहीं सकते
    शर्त ये भी है पा नही सकते

    किसी को अपने आँसुओं का सबब
    लाख चाहे बता नहीं सकते

    जिस पे लिक्खी है इबारत कोई
    हम वो दीवार ढा नही सकते

    उसको रिश्तों से है नफ़रत शायद
    कोई रिश्ता बना नहीं सकते

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  74. मैं देखना चाहता हूँ तुम्हारी आँखों से वह दुनिया एक बार फिर
    जिसे मैं छोड़ आया था काफी पीछे

    मैं तुम्हारे सपनों में पैठना चाहता हूँ
    मैं चाहता हूँ तुम्हारी हर प्रतिक्रिया का साझेदार बनना

    इन सबसे बढ़कर मैं चाहता हूँ
    इस नई दुनिया की नई संवेदना का स्वाद
    तुम्हारे मार्फत मुझ तक पहुँचे

    मुझे तुम्हें कुछ सीखाना नहीं सीखना है

    मुझे सीखनी है नई भाषा और नई संवेदना की लय
    मुझे सीखनी है एक और मातृभाषा तुम्हारे व्याकरण में

    मैं चाहता हूँ तुम्हारी मार्फ़त
    भूसे में दबा वह आम खोजना
    जो मैंने अपने बचपन में दबा कर चला आया था
    अपने गाँव से शहर

    मैं जानता हूँ कि तुम केवल तुम ही खोज सकती हो
    उसकी गंध के सहारे जो मुझ में तो अब खो चुकी है पर
    तुममें ज़रूर कहीं न कहीं अभी होगी सुरक्षित

    मैं चाहता हूँ उन किस्सों को याद करना
    किस्सों से दृश्य और धुन चुनना
    जो मेरी दादी ने सुनाए थे मुझे
    पर तुम तक नहीं पहुँची उसकी कोई आँच
    मैं चाहता हूँ तुम भी उससे तपो
    मैं चाहता हूँ अपने गाँव की गांगी नदी के पानी में
    फिर से धींगा मस्ती करना तुम्हारे माध्यम से
    जहाँ तुम कभी नहीं गई।

    मैं चाहता हूँ तुम मेरे गाँव एक बार ज़रूर जाओ
    यकीन है अमराई तुम्हें भी पहचान लेगी
    मेरे बिन बताए और तुम भी बिना किसी से पूछे
    पहुँच जाओगी उन सभी जगहों पर जहाँ मैंने
    अपना बचपन खोया है और जिसे खोजना तुम्हें भी अच्छा लगेगा।

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  75. दुनिया का बाज़ार भला है
    खरे परखी हैं व्यापारी
    तेरी एक खुशी के बदले
    मैं नीलाम अगर हो पाऊँ।

    चाहे वह कोई महफ़िल हो
    चाहे वह कोई आलम हो
    वह चाहे हँसता वसंत हो
    वह चाहे रोता सावन हो
    गूँज रहा जो क्षण-क्षण मेरा
    गीत, तभी सार्थक हो जाए
    तुम सरनाम अगर हो पाओ
    मैं बदनाम अगर हो पाऊँ।

    हर चेहरे में, तेरा चेहरा
    जाने क्यों मन ढूँढ़ रहा है
    जैसे कोई अंधापन
    स्पर्श से दर्शन ढूँढ रहा है
    यह परिचय, अन्तर्मन तक है
    यह पहचान और बढ़ जाए
    तेरे सिवा, सारी दुनिया से
    मैं अनजान अगर हो पाऊँ।

    तन से तन का मधुर-मिलन
    हो पाएगा, विश्वास नहीं है
    भले नैन सौ संगम कर लें
    मिटती किंचित प्यास नहीं है
    प्रणय-मिलन की ये आतुरता
    ले आए ऐसे पथ तक ही
    काश कि तुम मीरा हो पाती
    मैं घनश्याम अगर हो पाऊँ।

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  76. हार, किस काँधे पे धर दूँ
    जीत किस को भेंट कर दूँ
    कोई तो अपना नहीं था
    एक तुम थे, अब नही हो!

    किस तरह राहत बनेगी
    टूट जाने की हताशा
    थक गई साँसों को देगा
    कौन जीवन की दिलासा
    बिस्तरों पर सिलवटें अब
    नींद क्या, बस करवटें अब
    रात ने ताने दिए तो
    आँख में बस बात ये कि
    कोई तो सपना नहीं था
    एक तुम थे, अब नहीं हो!

    किस हथेली की रेखाओं
    का वरण मैंने किया है
    किसका, क्षणभर प्यार पाने
    को जनम मैंने लिया है
    इस प्रश्न का हल था मिला कल
    हाँ वही रीता हुआ पल
    जिसने मेरा गीत साधा
    जो कहो, रत्ना या राधा
    कोई तो इतना नहीं था
    एक तुम थे, अब नहीं हो!

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  77. तू एक बार मुझको पुकार
    बस एक बार मुझको पुकार।

    मन के साध न सध पाये
    यौवन की हाला रीत गयी
    स्वर भंग आलाप न ले पाया
    निष्ठुर खामोशी जीत गयी
    थक गया एकाकी थाम मुझे
    मैं इस जीवन से गया हार।

    कितने हलाहल वर्ष पिये
    घन-तिमिर से निकला ना प्रभात
    कितने ही झंझावातों ने
    आ चूमे ये रूखे गात
    अब चलाचली की बेला है
    आ जाने दे कुछ तो निखार।

    सौ-सौ जन्मों के पुण्य कहाँ
    कि हो पात तुमसे मिलाप
    नियति से उपहार मिला है
    रंग-रंग में मुझको विलाप
    अब प्रणय यज्ञ सध जाने दे
    धुल जाये सब मन के विकार।

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  78. बारहा तोहमतें गिला रखिए
    आप हमसे ये सिलसिला रखिए

    लूटने वाला हँसी है इतना
    जाँ से जाने का हौसला रखिए

    दिल की खिड़की अगर खुली हो तो
    दिल के चारों तरफ़ किला रखिए

    हमको देना है बहुत कुछ लेकिन
    क्या बताएँ कि आप क्या रखिए

    और क्या आजमाइशें होंगी
    पास आकर भी फ़ासला रखिए

    फिर भी तनहाइयाँ सताएँगी
    आप चाहे तो काफ़िला रखिए

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  79. Uma vez que você me chamar
    Apenas me chame de uma vez.

    Não podia entender o ato da mente
    Hala puberdade foi reet
    Falta de diálogo indignação voz
    Ganhou silêncio teimoso
    Cansado manter-me em paz
    Eu me perdi na vida.

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  80. जिन्दगी मेरी मुझसे डरती है
    मुझसे नजरें बचा के चलती है।

    दर्द का फर्श इतना चिकना है
    रात अक्सर फिसल के गिरती है।

    दिल की सुनसान झील में अक्सर
    कोई परछाईं-सी उभरती है।

    उसके पावों की सोच लेता हूँ
    जिसकी आहट से साँस चलती है।

    लोग मुझसे तो ये भी कहके गये
    उसकी सूरत मुझ ही से मिलती है।

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